RTE की करोड़ों की फीस वर्षों से अटकी, निजी स्कूल आर्थिक संकट में; संचालकों ने शासन से लगाई गुहार
*👁️मनेश साहु संपादक👁️ एवं मीडिया संगठन जिला अध्यक्ष छिन्दवाड़ा 9407073701🤝9131733420*
छिंदवाड़ा | जुलाई 2026
शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। इसी व्यवस्था के तहत निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें इन बच्चों के लिए आरक्षित की जाती हैं और उनकी फीस का भुगतान राज्य शासन द्वारा किया जाना होता है। लेकिन छिंदवाड़ा जिले के कई निजी विद्यालय संचालकों का कहना है कि RTE के तहत मिलने वाली फीस प्रतिपूर्ति पिछले कई वर्षों से लंबित है, जिससे विद्यालयों पर गंभीर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है।
विद्यालय संचालकों के अनुसार वे शासन के निर्देशों का पालन करते हुए लगातार गरीब एवं वंचित वर्ग के बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। हालांकि, उनका कहना है कि समय पर फीस प्रतिपूर्ति नहीं मिलने के कारण शिक्षकों के वेतन, भवन किराया, बिजली-पानी के बिल, परिवहन व्यवस्था और अन्य आवश्यक खर्चों का संचालन करना लगातार कठिन होता जा रहा है। उनका दावा है कि यदि लंबित राशि शीघ्र जारी नहीं हुई तो कई विद्यालयों के नियमित संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
संचालकों का यह भी कहना है कि इस संबंध में संबंधित विभाग के अधिकारियों को कई बार आवेदन और ज्ञापन दिए जा चुके हैं। उनके अनुसार अब तक अपेक्षित समाधान नहीं मिल पाया है। हालांकि, इस मामले में संबंधित विभाग की ओर से सार्वजनिक रूप से क्या जवाब या कार्रवाई की गई है, इसकी आधिकारिक जानकारी सामने आना अभी बाकी है।
RTE अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रहती हैं तथा इन विद्यार्थियों की निर्धारित फीस की प्रतिपूर्ति शासन द्वारा की जानी होती है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रतिपूर्ति समय पर होती रहे तो विद्यालयों का संचालन भी सुचारु रहेगा और बच्चों की पढ़ाई भी बिना किसी बाधा के जारी रह सकेगी।
निजी विद्यालय संचालकों ने मुख्यमंत्री, स्कूल शिक्षा विभाग, कलेक्टर एवं जिला शिक्षा अधिकारियों से मांग की है कि वर्षों से लंबित RTE फीस प्रतिपूर्ति का सत्यापन कर शीघ्र एकमुश्त भुगतान कराया जाए। साथ ही भविष्य के लिए ऐसी समय-सीमा तय की जाए जिससे भुगतान नियमित रूप से होता रहे और विद्यालयों को आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े। उन्होंने यह भी आग्रह किया है कि भुगतान में हुई देरी के कारणों की विभागीय स्तर पर समीक्षा की जाए।
यह मामला केवल विद्यालयों की आर्थिक परेशानी का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है जिसके माध्यम से हजारों गरीब बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित की जाती है। यदि प्रतिपूर्ति में लगातार देरी होती है, तो इसका असर अंततः शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। अब सभी की निगाहें शासन और संबंधित विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं।
🗣️ मनेश पत्रकार आपसे पूछता है…
क्या RTE के तहत गरीब बच्चों को पढ़ाने वाले निजी विद्यालयों की फीस प्रतिपूर्ति तय समय-सीमा में अनिवार्य रूप से जारी होनी चाहिए? अपनी राय कमेंट9407073701 में जरूर बताइए।
