विकास के दावों के बीच कच्चे मकान में स्कूल, दो महीने से भवनविहीन मासूम

chif editor MANESH SAHU 9407073701
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*विकास के दावों के बीच कच्चे मकान में स्कूल, दो महीने से भवनविहीन मासूम
विकास के दावों के बीच कच्चे मकान में स्कूल, दो महीने से भवनविहीन मासूम*

तामिया के बीजाढाना में विकास के दावों की खुली पोल, जर्जर स्कूल से निकलकर खेत के कच्चे मकान में पढ़ने को मजबूर बच्चे

छिंदवाड़ा/तामिया | संवाददाता-आकाश मंडराह

तामिया का नाम आते ही प्राकृतिक सौंदर्य, घने जंगल, खूबसूरत वादियां, रहस्यमयी घाटियां और पर्यटन की तस्वीर आंखों के सामने उभरने लगती है। पर्यटन के विकास और क्षेत्र को देश-दुनिया के नक्शे पर पहचान दिलाने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन इन्हीं दावों के बीच तामिया विकासखंड के ग्राम बीजाढाना की जमीनी हकीकत सरकारी व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल बनकर खड़ी है। ग्राम पंचायत चोपना के अंतर्गत आने वाले बीजाढाना गांव में संचालित शासकीय प्राथमिक शाला पिछले करीब दो महीने से अपने स्थायी भवन के बिना संचालित हो रही है और मासूम बच्चे खेत में बने एक कच्चे मकान में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और स्कूल बैग होने चाहिए, जिस उम्र में उन्हें सुरक्षित और बेहतर वातावरण में शिक्षा मिलनी चाहिए, उस उम्र में वे जर्जर स्कूल भवन के खतरे से बचने के लिए कच्चे मकान में बैठकर अपना भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

बीजाढाना की यह तस्वीर सिर्फ एक स्कूल की बदहाली की कहानी नहीं है, बल्कि उन तमाम सरकारी दावों पर सवाल खड़ा करती है जिनमें दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराने की बात कही जाती है। सरकार की ओर से आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों के लिए प्रधानमंत्री जनमन योजना सहित अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए करोड़ों रुपये के बजट की बात कही जाती है, लेकिन तामिया के इस गांव में बच्चों के लिए एक सुरक्षित स्कूल भवन तक उपलब्ध नहीं हो पाया है। सवाल यह नहीं है कि गांव कितना दूर है या स्कूल में बच्चों की संख्या कितनी है, सवाल यह है कि क्या दूरस्थ गांव में रहने वाले बच्चों का शिक्षा पर अधिकार शहरों में रहने वाले बच्चों से कम है।

स्कूल में पढ़ा रहे अतिथि शिक्षकों के अनुसार पुराने स्कूल भवन की हालत जर्जर हो चुकी है और भवन कभी भी गिर सकता है। बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए ग्रामीणों से चर्चा की गई और स्कूल को फिलहाल खेत में बने कच्चे मकान में संचालित करने की व्यवस्था की गई। तत्काल परिस्थितियों में बच्चों को जर्जर भवन से बाहर निकालना शायद मजबूरी रही होगी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि दो महीने गुजर जाने के बाद भी यह अस्थायी व्यवस्था स्थायी समाधान में क्यों नहीं बदल सकी। यदि पुराना भवन इतना जर्जर है कि उसमें बच्चों को बैठाना सुरक्षित नहीं है तो उसकी मरम्मत क्यों नहीं हुई। यदि भवन मरम्मत के योग्य नहीं है तो नए भवन की प्रक्रिया क्यों शुरू नहीं हुई। और यदि नया भवन बनने में समय लगना है तो बच्चों के लिए कोई सुरक्षित वैकल्पिक भवन उपलब्ध कराने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई।

जनशिक्षक दिलीप भारती के अनुसार स्कूल भवन की समस्या को लेकर कई बार उच्च अधिकारियों को जानकारी दी जा चुकी है, लेकिन अभी तक समस्या का समाधान नहीं हुआ है। ग्रामीणों और जनशिक्षक का कहना है कि ग्राम पंचायत चोपना के सचिव के सामने ग्राम सभा में भी कई बार स्कूल भवन की मरम्मत का मुद्दा उठाया गया, लेकिन उनकी मांग पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जनशिक्षक दिलीप भारती ने यह भी बताया कि जनपद पंचायत के इंजीनियर राजिक खान को भी भवन की मरम्मत के संबंध में कई बार जानकारी दी गई और काम कराने की मांग की गई, लेकिन अब तक कोई काम शुरू नहीं हुआ है। यदि ग्रामीणों और जनशिक्षक की ओर से किए गए दावों की पुष्टि संबंधित रिकॉर्ड से होती है तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि आखिर बच्चों के स्कूल की समस्या किस स्तर पर अटकी हुई है।

सरकार की योजनाओं और बीजाढाना की वास्तविक तस्वीर के बीच दिखाई देने वाला यह अंतर इसलिए भी परेशान करने वाला है क्योंकि शिक्षा किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल है। सड़क, बिजली, पानी और दूसरी विकास योजनाओं की तरह स्कूल भवन भी बुनियादी आवश्यकता है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां बच्चे पहले ही अनेक कठिन परिस्थितियों के बीच शिक्षा प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर ऐसे क्षेत्रों में स्कूल भवन भी सुरक्षित नहीं होंगे तो सरकार की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

दूरस्थ गांवों में अक्सर यह तर्क सामने आता है कि बच्चों की संख्या कम है, इसलिए सुविधाओं की व्यवस्था में समय लगता है। लेकिन क्या बच्चों की संख्या कम होने से उनके अधिकार भी कम हो जाते हैं। यदि किसी गांव में कुछ ही बच्चे हैं तो क्या उन्हें असुरक्षित भवन या कच्चे मकान में पढ़ने के लिए छोड़ दिया जाए। शिक्षा का अधिकार संख्या देखकर तय नहीं किया जा सकता। एक बच्चा भी स्कूल में पढ़ रहा है तो उसकी सुरक्षा और शिक्षा की जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की है। बीजाढाना के बच्चों को भी वही अधिकार मिलना चाहिए जो भोपाल, इंदौर या प्रदेश के किसी बड़े शहर में पढ़ने वाले बच्चों को मिलता है।

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासनिक अधिकारी क्षेत्र का दौरा करते हैं, लेकिन स्कूल की इस स्थिति पर अब तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। ग्रामीणों की शिकायत यह भी है कि यदि शिक्षा विभाग के अधिकारी नियमित रूप से स्कूलों का निरीक्षण करें तो दूरस्थ क्षेत्रों के स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। ग्रामीणों ने तामिया विकासखंड के शिक्षा विभाग के अधिकारियों के निरीक्षण को लेकर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि इस संबंध में संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है। प्रशासन को चाहिए कि वह ग्रामीणों और जनशिक्षक की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए मौके का निरीक्षण करे और स्कूल भवन की वास्तविक स्थिति की तकनीकी जांच कराए।

सबसे बड़ा सवाल बच्चों की सुरक्षा का है। यदि पुराना भवन जर्जर है और उसके गिरने का खतरा है तो बच्चों को वहां पढ़ाना निश्चित रूप से जोखिम भरा हो सकता है। लेकिन खेत में बने कच्चे मकान में दो महीने से स्कूल चलाना भी कोई स्थायी समाधान नहीं है। बारिश के मौसम में कच्चे मकान की स्थिति क्या होगी, तेज बारिश या आंधी में बच्चों की सुरक्षा कैसे होगी, जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा कितना है और बच्चों के लिए वहां बैठने, पढ़ने और अन्य आवश्यक सुविधाएं कितनी उपलब्ध हैं, इन तमाम सवालों का जवाब प्रशासन को देना होगा।

बीजाढाना की कहानी उस समय और ज्यादा गंभीर हो जाती है जब तामिया को पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की बात होती है। पर्यटकों के लिए सुविधाएं विकसित करने पर सरकार और प्रशासन गंभीरता से काम कर सकते हैं तो गांव के बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल भवन उपलब्ध कराने में इतनी देरी क्यों है। पर्यटन से क्षेत्र की तस्वीर बदलने का दावा तभी सार्थक होगा जब विकास की रोशनी उन गांवों तक भी पहुंचे जहां आज बच्चे कच्चे मकान में बैठकर पढ़ रहे हैं।

हमारी टीम जब बीजाढाना पहुंची तो स्कूल की वास्तविक स्थिति कैमरे में कैद हुई। यह तस्वीर किसी सरकारी रिपोर्ट की भाषा नहीं बोलती, बल्कि खुद सवाल करती है। एक तरफ विकास की योजनाओं के आंकड़े हैं और दूसरी तरफ खेत के कच्चे मकान में बैठकर पढ़ते मासूम हैं। एक तरफ योजनाओं के बजट हैं और दूसरी तरफ स्कूल भवन के लिए इंतजार करते ग्रामीण हैं। एक तरफ अधिकारियों के दौरे हैं और दूसरी तरफ जर्जर स्कूल भवन की समस्या है।

अब प्रशासन के सामने सबसे जरूरी सवाल यही है कि बीजाढाना के बच्चों को सुरक्षित स्कूल भवन कब मिलेगा। ग्रामीणों और जनशिक्षक की ओर से बार-बार जानकारी दिए जाने के दावों की जांच भी होनी चाहिए और यह पता लगाया जाना चाहिए कि आखिर समस्या का समाधान क्यों नहीं हुआ। यदि भवन मरम्मत योग्य है तो तत्काल मरम्मत कराई जाए और यदि भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है तो नए भवन की प्रक्रिया शुरू की जाए। जब तक स्थायी व्यवस्था नहीं होती, तब तक बच्चों को किसी सुरक्षित भवन में पढ़ाने की व्यवस्था करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।

बीजाढाना के बच्चे कोई विशेष सुविधा नहीं मांग रहे हैं। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उन्हें पढ़ने के लिए एक सुरक्षित छत मिल जाए। उनके माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे शिक्षा हासिल कर अपने भविष्य को बेहतर बना सकें। सरकार भी शिक्षा को विकास का आधार बताती है। फिर इन बच्चों को विकास की इस बुनियादी सुविधा से वंचित क्यों रखा जा रहा है।

तामिया की खूबसूरत वादियों के बीच बीजाढाना की यह बदहाल तस्वीर अब प्रशासन के सामने है। सवाल बहुत सीधा है और इसका जवाब भी सीधा होना चाहिए। जब पर्यटन और विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा सकते हैं, जब दूरस्थ क्षेत्रों के विकास के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाई जा सकती हैं, तो बीजाढाना के मासूम बच्चों के लिए एक सुरक्षित स्कूल भवन क्यों नहीं बन सकता। आखिर जिम्मेदार अधिकारी कब जागेंगे और कब इस गांव के बच्चों को कच्चे मकान से निकालकर उनके अपने सुरक्षित स्कूल भवन तक पहुंचाया जाएगा।

क्योंकि बीजाढाना के बच्चों को विकास के दावे नहीं चाहिए, उन्हें पढ़ने के लिए एक सुरक्षित स्कूल की छत चाहिए।

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