मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से सामने आया एक मामला अब सिर्फ एक ग्राम पंचायत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे पंचायती राज सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। मामला ग्राम पंचायत मोहखेड़ का है, जहां मनरेगा योजना के तहत ₹1 लाख 75 हजार 61 रुपये के कथित वित्तीय गबन की पुष्टि जांच में होने के बाद भी सरपंच के खिलाफ पद से हटाने की कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा, अधिकारियों के एक जवाब ने प्रशासनिक व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है।
हाल ही में सीएम हेल्पलाइन में दर्ज शिकायत के निराकरण में जिला स्तर के अधिकारी ने लिखित रूप से कहा कि “गबन की राशि जनपद पंचायत के खाते में जमा करा दी गई है, इसलिए सरपंच को पद से पृथक करने की मांग अब निराधार है।”
बस… यहीं से विवाद भड़क उठा।
ग्रामीणों और कानून जानकारों का सवाल सीधा है— क्या सिर्फ पैसा वापस कर देने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाता है?
अगर ऐसा है तो फिर कानून का डर किसके लिए है?
बताया जा रहा है कि यह पूरा मामला मनरेगा योजना से जुड़ा है, जो केंद्र सरकार का कानून है। मनरेगा अधिनियम 2005 की धारा 27 में वित्तीय गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की स्थिति में कठोर कार्रवाई का प्रावधान बताया गया है। वहीं मध्यप्रदेश पंचायती राज अधिनियम 1993 की धारा 40 के तहत वित्तीय अनियमितता या कदाचार सिद्ध होने पर सरपंच को पद से हटाने की प्रक्रिया लागू की जा सकती है।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है।
जब जांच प्रतिवेदन के आधार पर राशि की वसूली हुई, तो क्या यह अपने आप में वित्तीय अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जाएगा?
और अगर माना जाएगा, तो फिर धारा 40 के तहत कार्रवाई क्यों नहीं?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि राशि जमा हो जाने से “दोष” समाप्त नहीं होता। वसूली केवल सरकारी धन की रिकवरी है, जबकि पद पर रहते हुए कथित कदाचार अलग विषय है। ऐसे मामलों में सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वतंत्र निर्णय लिया जाना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और बड़ा सवाल अधिकारियों की भूमिका पर उठ रहा है। जानकारों के मुताबिक, किसी सरपंच को पद से हटाने या न हटाने का अंतिम अधिकार जिला कलेक्टर के न्यायालय के पास होता है। ऐसे में सीएम हेल्पलाइन के जवाब में किसी अधिकारी द्वारा शिकायत को “निराधार” बताना कई लोगों को प्रक्रिया से परे कदम लग रहा है।
मामला अब प्रशासनिक दफ्तरों से निकलकर न्यायालय पहुंच चुका है। शिकायतकर्ता ने जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अधिकारियों के जवाब और कथित निष्क्रियता को चुनौती दी है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि भ्रष्टाचार सिद्ध होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई से बच रहे हैं। हालांकि अंतिम निर्णय अब न्यायालय के आदेश पर निर्भर करेगा।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इसका असर भविष्य की पंचायत व्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि भ्रष्टाचार के मामलों में सिर्फ राशि जमा करवाकर कार्रवाई टालने की परंपरा बनती है, तो इससे जवाबदेही की पूरी व्यवस्था पर सवाल उठ सकते हैं।
अब निगाहें जबलपुर हाईकोर्ट पर हैं… जहां तय होगा कि पंचायतों में भ्रष्टाचार के मामलों में कानून की असली व्याख्या क्या होगी।
👉 मनेश पत्रकार आपसे पूछता है…
अगर किसी जनप्रतिनिधि पर गबन साबित हो जाए और वह सिर्फ पैसा वापस कर दे, तो क्या उसे पद पर बने रहने का अधिकार मिल जाना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।
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