लाल किले पर जनजातीय संस्कृति का महाकुंभ, धर्म-संस्कृति और पहचान की रक्षा की गूंजी मांग

chif editor MANESH SAHU 9407073701
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सच की आँखे नई दिल्ली। देशभर के विभिन्न जनजातीय समुदायों का विशाल सांस्कृतिक समागम नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर आयोजित हुआ। आयोजन में देश के लगभग 500 विभिन्न जनजातीय समुदायों के दो लाख से अधिक लोगों ने भाग लेकर अपनी समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का भव्य प्रदर्शन किया।

समागम के दौरान जनजातीय समाज ने एक स्वर में अपनी धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाज, प्रथाओं, आस्था, विश्वास, परंपरा और पहचान की रक्षा की मांग उठाई। प्रतिभागियों का कहना था कि जनजातीय समाज की सांस्कृतिक अस्मिता और पारंपरिक जीवन शैली को संवैधानिक एवं सामाजिक स्तर पर संरक्षण मिलना चाहिए।

कार्यक्रम के तहत नई दिल्ली के पांच अलग-अलग स्थानों से पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्ययंत्रों और सांस्कृतिक झांकियों के साथ विशाल शोभायात्राएं निकाली गईं, जो लाल किले तक पहुंचीं। भीषण गर्मी और लगभग 48 डिग्री तापमान के बावजूद जनजातीय समाज का उत्साह देखने लायक था।

शोभायात्रा के मार्ग में दिल्लीवासियों ने विभिन्न स्थानों पर पुष्प वर्षा कर जनजातीय समाज का स्वागत किया। आयोजन की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि इतने बड़े जनसमूह के बावजूद कहीं भी अव्यवस्था, हिंसा या जानमाल की हानि की कोई घटना सामने नहीं आई, जिससे जनजातीय समाज के अनुशासन और सामाजिक मूल्यों की व्यापक सराहना हुई।
वक्ताओं ने कहा कि जनजातीय समुदाय भारत की सांस्कृतिक पहचान और विरासत के वास्तविक प्रतिनिधि हैं। इनके प्रकृति प्रेम, सामुदायिक जीवन, अनुशासन, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को समझने तथा उनसे सीखने की आज पूरे समाज को आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता को सशक्त बनाने में जनजातीय समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है और उसकी पहचान एवं परंपराओं की रक्षा समय की मांग है।

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