मेडिकल कॉलेज मेस विवाद में बड़ा खुलासादस्तावेजों से उजागर हुई मनमानी – डीन पर लगे गंभीर आरोप, जांच की मांग तेज

मेडिकल कॉलेज मेस विवाद में बड़ा खुलासा

दस्तावेजों से उजागर हुई मनमानी – डीन पर लगे गंभीर आरोप, जांच की मांग तेज
 / छिंदवाड़ा।
सरकारी मेडिकल कॉलेज के मेस संचालन को लेकर उठे विवाद में अब नए दस्तावेजों ने बड़ा खुलासा कर दिया है। एग्रीमेंट, थाना आवेदन और छात्रों की शिकायतों ने पूरे मामले को गंभीर प्रशासनिक अनियमितताओं के दायरे में ला दिया है। आरोप है कि कॉलेज प्रबंधन ने 2026 तक वैध अनुबंध के बावजूद आधी रात मेस खाली कराकर नया संचालन शुरू कर दिया—वह भी बिना नोटिस, बिना टेंडर और बिना समिति की मंजूरी के।

एग्रीमेंट 2026 तक वैध, फिर भी आधी रात ताला तोड़ा गया

मेस संचालिका अनुराधा चौरे द्वारा प्रस्तुत अनुबंध दस्तावेज साफ बताते हैं कि उनका एग्रीमेंट वर्ष 2026 तक वैध है। इसके बावजूद कॉलेज डीन ने—जैसा कि आवेदन में कहा गया है—

रात में मेस का ताला तुड़वाया,

सामान बाहर फेंकवाया,

और मेस संचालन बंद करा दिया।


अनुबंध की शर्तों के अनुसार नोटिस, समिति बैठक और निविदा प्रक्रिया अनिवार्य है, लेकिन तीनों ही औपचारिकताओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।

पुलिस आवेदन में कई गंभीर आरोप

संचालिका के अनुसार—

हाईकोर्ट के स्टे आदेश की अवहेलना की गई,

कलेक्टर के निर्देशों को अनसुना किया गया,

30–35 लाख रुपये का लंबित भुगतान रोका गया,

प्रबंधन द्वारा दबाव डालकर मेस बंद कराया गया।


ये आरोप प्रशासनिक अनुशासनहीनता और अधिकारों के दुरुपयोग की ओर संकेत करते हैं।

टेंडर प्रक्रिया को दरकिनार कर नया संचालन

सूत्र बताते हैं कि मेस का संचालन सीधे दीनदयाल रसोई के संचालक आशु डागा को दे दिया गया। हैरानी की बात यह कि

न कोई ई-टेंडर,

न निविदा,

और न समिति की स्वीकृति


तीनों अनिवार्य प्रक्रियाएं दरकिनार कर दी गईं। वित्तीय नियमों के मुताबिक यह गंभीर उल्लंघन माना जाता है।

छात्रों की लगातार शिकायतों ने बढ़ाई गंभीरता

पिछले तीन महीनों से छात्रों द्वारा मिलने वाले भोजन में—
कॉकरोच, इल्ली, लार्वा, खराब क्वालिटी की दाल-सब्जी और अस्वच्छ किचन—जैसी शिकायतें दर्ज की गई थीं।
जबलपुर से आए 18 महीने के प्रशिक्षणरत छात्रों ने भी इसी तरह की शिकायतें की थीं।

नया मेस शुरू होने के बाद छात्राओं ने भोजन की गुणवत्ता बेहतर होने की पुष्टि की है, जिससे पुराने मेस की स्थिति पर भी सवाल उठ रहे हैं।

प्रशासन की भूमिका पर बड़े सवाल

2026 तक वैध एग्रीमेंट होने के बावजूद मेस क्यों हटाया गया?

हाईकोर्ट और कलेक्टर के निर्देशों की अवहेलना किसकी जिम्मेदारी?

बिना निविदा नई व्यवस्था किस आधार पर लागू की गई?

लाखों रुपये का भुगतान क्यों रोका गया?

इन सवालों के जवाब अब तक कॉलेज प्रबंधन की ओर से नहीं मिले हैं।

जांच और कार्रवाई की मांग तेज

जिले के सामाजिक संगठनों, छात्र प्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि मामले की उच्च स्तरीय जांच करवाई जाए और जिम्मेदार अधिकारियों—विशेष रूप से डीन—पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
साथ ही 30–35 लाख रुपये का भुगतान तत्काल जारी करने की भी मांग उठ रही है।

मामला अब जिले में व्यापक चर्चा का विषय बन गया है और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन आने वाले दिनों में इस प्रकरण पर क्या रुख अपनाता है।

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