“सरकारी दफ्तर, जनता की मजबूरी और रिश्वत का खुला खेल — छिंदवाड़ा सीएमएचओ ऑफिस में 50 हजार की रिश्वत लेते ऑपरेटर रंगे हाथों पकड़ा गया”
जब एक नर्स अपनी बीमारी और पारिवारिक मजबूरी के चलते इंसाफ की गुहार लगाती है, और बदले में उसे रिश्वत की कीमत बताई जाती है — तब सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, पूरे सिस्टम का खड़ा हो जाता है। छिंदवाड़ा के सीएमएचओ कार्यालय में सामने आया यह मामला इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करता है।
मामला 21 जनवरी 2026 से जुड़ा है, जब रोहना अस्पताल में पदस्थ नर्स पुष्पा बड़कडे ने जबलपुर लोकायुक्त में एक गंभीर शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में बताया गया कि वह लंबे समय से किडनी से जुड़ी बीमारी (किडनी की मैरिज/समस्या) से जूझ रही हैं और इसी कारण अपना स्थानांतरण करवाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कलेक्टर की जनसुनवाई में भी आवेदन दिया था।
सूत्रों के अनुसार, कलेक्टर ने जनसुनवाई के दौरान सीएमएचओ को मौखिक रूप से नर्स के स्थानांतरण के निर्देश दिए थे। लेकिन इसके बाद भी काम आगे नहीं बढ़ा। यहीं से शुरू हुआ रिश्वत का खेल।
पीड़िता के अनुसार, सीएमएचओ कार्यालय में पदस्थ ऑपरेटर जितेंद्र सिंह यदुवंशी ने स्थानांतरण कराने के बदले ₹50,000 की मांग की। नर्स पुष्पा बड़कडे ने अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए ₹20,000 में काम करने की विनती भी की, लेकिन आरोपी ऑपरेटर ने साफ शब्दों में कहा —
“₹50,000 देने होंगे, सीएमएचओ साहब नहीं मानेंगे… पूरी रकम देनी पड़ेगी।”
यह संवाद सिर्फ रिश्वत की मांग नहीं, बल्कि सिस्टम के नाम पर डराने की कोशिश भी थी।
मजबूर होकर पीड़िता ने 21 जनवरी को जबलपुर लोकायुक्त कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत की प्राथमिक जांच के बाद लोकायुक्त टीम ने कार्रवाई की योजना बनाई।
आज कार्रवाई के दौरान, जब आरोपी ऑपरेटर जितेंद्र सिंह यदुवंशी ने सीएमएचओ कार्यालय परिसर में ₹50,000 की रिश्वत ली, उसी समय लोकायुक्त की टीम ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया।
लोकायुक्त इंस्पेक्टर बृजमोहन सिंह नरवरिया ने बताया कि शिकायत सत्य पाए जाने पर नियमानुसार ट्रैप कार्रवाई की गई और आरोपी को रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। मामले में आगे की वैधानिक कार्रवाई जारी है।
यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि
क्या सरकारी आदेश भी बिना “चढ़ावे” के लागू नहीं होते?
क्या बीमारी और मजबूरी भी अब सौदेबाज़ी का जरिया बन चुकी है?
लोकायुक्त की इस कार्रवाई से आम जनता में यह संदेश जरूर गया है कि शिकायत करने पर कार्रवाई संभव है, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि ऐसे कई मामले आज भी डर, मजबूरी और चुप्पी की वजह से सामने नहीं आ पाते।
मनेश पत्रकार आपसे पूछता है…
👉 क्या आपको लगता है कि सिर्फ कार्रवाई काफी है, या सरकारी दफ्तरों में जमी इस “रिश्वत संस्कृति” को खत्म करने के लिए और सख्त व स्थायी सुधार ज़रूरी हैं?
कमेंट में अपनी राय जरूर
0 टिप्पणियाँ