लखनादौन, 21 अप्रैल।
महिला आरक्षण, परिसीमन और जातीय जनगणना को लेकर देश में चल रही बहस के बीच तथ्य और राजनीतिक मतों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इस मुद्दे पर लखनादौन के सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता उमेश गोल्हानी बंधु ने स्पष्ट किया कि विषय को समझने के लिए तथ्य और मत के बीच अंतर करना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 में महिला आरक्षण विधेयक संसद के दोनों सदनों में भारी बहुमत से पारित हो चुका है, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का समर्थन शामिल रहा। ऐसे में “बिल गिरने” जैसी चर्चाएं तथ्यात्मक नहीं हैं।
गोल्हानी के अनुसार वर्तमान विवाद विधेयक के पारित होने को लेकर नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया और समयसीमा को लेकर है। सरकार का मत है कि नई जनगणना और उसके आधार पर परिसीमन के बाद ही महिला आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू किया जा सकता है। वहीं विपक्ष का तर्क है कि इस शर्त के कारण इसका लागू होना अनिश्चितकाल तक टल सकता है, इसलिए इसे तत्काल लागू किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण के अंतर्गत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की महिलाओं के लिए पृथक आरक्षण तथा जातीय जनगणना के आधार पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग भी प्रमुखता से उठ रही है।
“बिल गिरने” के दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि महिला आरक्षण विधेयक विधिक रूप से अस्तित्व में है और निरस्त नहीं हुआ है। परिसीमन और अन्य प्रक्रियाओं को लेकर चल रही राजनीतिक बयानबाजी को कुछ स्थानों पर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है।
जातीय जनगणना के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि यह वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके माध्यम से विभिन्न वर्गों, विशेषकर ओबीसी समुदाय की वास्तविक जनसंख्या और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सटीक आकलन संभव हो सकेगा, जिससे नीति निर्माण और आरक्षण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाया जा सकेगा।
अंत में उन्होंने नागरिकों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों से अपील की कि वे इस विषय पर तथ्य आधारित, संयमित और रचनात्मक संवाद को बढ़ावा दें तथा भ्रामक जानकारी से बचते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सशक्त करें।
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