"सफलता की कहानी"कृषक कल्याण वर्ष 2026 : महिला किसान ने पेश की महिला सशक्तिकरण की मिसालप्राकृतिक खेती से आत्मनिर्भर बनीं श्रीमती वंदना इंगलेकेंचुआ खाद और प्राकृतिक खेती ने बदली जिंदगी


 सच की आंखें छिन्‍दवाड़ा/16 मई 2026/
 छिंदवाड़ा जिले के मारई गांव की रहने वाली महिला कृषक श्रीमती वंदना इंगले ने यह साबित कर दिया है कि यदि किसान आधुनिक सोच के साथ प्राकृतिक खेती अपनाए, तो खेती केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं बल्कि सम्मान और समृद्धि का माध्यम भी बन सकती है। महिला सशक्तिकरण और कृषक कल्याण वर्ष 2026 के संदर्भ में उनकी सफलता ग्रामीण महिलाओं और किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

संघर्ष से सफलता तक का सफर - श्रीमती वंदना इंगले पति श्री तुकाराम इंगले, के पास लगभग 2 एकड़ कृषि भूमि, 3 देसी गायें तथा सिंचाई के लिए एक कुआँ उपलब्ध था। वे कई वर्षों से खरीफ सीजन में मक्का तथा रबी सीजन में गेहूँ की खेती पारंपरिक रासायनिक पद्धति से करती आ रही थीं। लगातार रासायनिक खेती के कारण उत्पादन लागत बढ़ती जा रही थी, जबकि खेत की मिट्टी की उर्वरता घट रही थी। कम उत्पादन और बढ़ते खर्च के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित हो रही थी।

कृषि विभाग से मिली नई दिशा - वर्ष 2016-17 में कृषि विभाग की आत्मा परियोजना के अधिकारियों से संपर्क होने पर उन्हें जैविक एवं प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी मिली। यह जानकारी उनके जीवन में परिवर्तन का आधार बनी। परम्परागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत गांव में 50 किसानों का एक क्लस्टर बनाया गया और जैविक एवं प्राकृतिक खेती की ट्रेनिंग दी गई, जिसमें श्रीमती वंदना इंगले ने सक्रिय भागीदारी निभाई और अन्य किसानों को भी इससे जुड़ने के लिए प्रेरित किया।
      योजना के तहत कृषि विभाग द्वारा उनके खेत पर 8×4×1 आकार का केंचुआ खाद टांका बनाया गया तथा 2 किलो केंचुए उपलब्ध कराए गए। यहीं से उनके जीवन में नई शुरुआत हुई। प्रारंभिक सफलता के बाद उन्होंने स्वयं के खर्च से चार अतिरिक्त केंचुआ टांकों का निर्माण कराया और बड़े स्तर पर वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन प्रारंभ किया।

प्राकृतिक खेती बनी आय का मजबूत आधार - आज कृषक श्रीमती वंदना इंगले अपने खेत में देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार बीजामृत, जीवामृत, नीमास्त्र जैसे प्राकृतिक खेती के अवयवों का उपयोग कर रही हैं। इतना ही नहीं, वे अतिरिक्त जैविक खाद और जैविक दवाइयों की पैकेजिंग कर आसपास के किसानों को उचित मूल्य पर बेच भी रही हैं।
        उनकी खेती में अब रासायनिक उर्वरकों और जहरीली दवाइयों का उपयोग पूरी तरह बंद हो चुका है। प्राकृतिक खेती अपनाने से खेत की मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ हुई है तथा सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि हुई है, जिससे फसलों का उत्पादन बेहतर हो रहा है।

खेती के साथ स्वरोजगार का सफल मॉडल- प्राकृतिक खेती के साथ-साथ श्रीमती वंदना इंगले पशुपालन, दूध विक्रय, जैविक सब्जियों, अनाज और फलों के उत्पादन से भी अच्छी आय अर्जित कर रही हैं। उन्होंने खेती को बहुआयामी स्वरोजगार मॉडल में बदल दिया है।

5 लाख से अधिक पहुंची वार्षिक आय - रासायनिक खेती छोड़ने से लागत में लगभग ₹50,000 वार्षिक कमी आए। दूध विक्रय से लगभग ₹12,000 प्रतिमाह शुद्ध आय प्राप्त होने लगी। केंचुआ खाद एवं जीवामृत विक्रय से लगभग ₹1 लाख वार्षिक आय और खरीफ एवं रबी दोनों सीजन की फसलों से लगभग ₹4 लाख वार्षिक शुद्ध लाभ होता है। इस प्रकार उनकी कुल वार्षिक शुद्ध आय लगभग ₹6.44 लाख तक पहुंच गई है।

महिला सशक्तिकरण की प्रेरक मिसाल - श्रीमती वंदना इंगले “प्रेरणा स्व सहायता समूह” की सक्रिय सदस्य हैं। उनके कार्यों को देखकर गांव की अन्य महिलाएं और किसान भी प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित हुए हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि महिलाएं केवल खेती में सहयोगी नहीं बल्कि कृषि उद्यमिता की मजबूत आधारशिला भी बन सकती हैं।

सम्मान और उपलब्धियां - उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए कृषि विभाग एवं आत्मा परियोजना द्वारा कई बार सम्मानित किया जा चुका है। विभाग द्वारा उन्हें प्रशिक्षण एवं कृषि भ्रमण का अवसर प्रदान किया गया, जिसका उपयोग उन्होंने अपने खेत में सफलतापूर्वक किया।
      उनके खेत का निरीक्षण जिला कलेक्टर, उप संचालक कृषि तथा विभिन्न विकासखंड अधिकारियों द्वारा किया जाता है, जहां किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दिया जाता है।
       इसके अतिरिक्त उनके “प्रेरणा स्व सहायता समूह” को विभाग द्वारा ₹10,000 की सीड मनी तथा जिला स्तरीय सर्वोत्तम कृषक पुरस्कार से सम्मानित होने पर  ₹20,000 की राशि भी प्रदान की गई।
      श्रीमती वंदना इंगले जैसी महिला कृषकों की कहानी यह दर्शाती है कि प्राकृतिक खेती केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि किसानों की आर्थिक उन्नति और महिला सशक्तिकरण का प्रभावी रास्ता भी है। उन्होंने सीमित संसाधनों में नवाचार, मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर खेती को लाभकारी व्यवसाय में परिवर्तित कर एक नई पहचान बनाई है। आज वे अपने क्षेत्र की महिलाओं और किसानों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।

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